Ikkis Movie Review: शहादत, संवेदना और सवालों से भरी ‘Ikkis’, धर्मेंद्र का…

Ikkis Movie Review: शहादत, संवेदना और सवालों से भरी ‘Ikkis’, धर्मेंद्र का अभिनय रुलाता है, अगस्त्य नंदा ने छोड़ी मजबूत छाप

1971 के युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘Ikkis’ सिर्फ जंग की कहानी नहीं, बल्कि शहादत, परिवार, भावनाओं और युद्ध के मायने पर गहराई से सवाल उठाती है।

01 जनवरी 2026 , नई दिल्ली

कुछ फिल्में मनोरंजन से आगे जाकर दिल और दिमाग दोनों को छू जाती हैं। ‘Ikkis’ भी ऐसी ही एक फिल्म है, जो आपको गर्व से भर देती है, भावुक कर देती है और अंत तक सोचने पर मजबूर करती है। यह फिल्म युद्ध की वीरता के साथ-साथ उसकी कीमत को भी सामने रखती है।

कहानी

‘Ikkis’ सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की बहादुरी और बलिदान की कहानी है, जो 1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हो गए थे। कहानी को उनके पिता ब्रिगेडियर एम.एल. खेत्रपाल के नजरिए से दिखाया गया है, जो करीब 30 साल बाद पाकिस्तान की यात्रा करते हैं। फिल्म धीरे-धीरे अरुण के व्यक्तित्व, उसके सपनों और युद्ध के भयावह सच को सामने लाती है। यह सिर्फ जंग के मैदान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सैनिकों और उनके परिवारों के जज़्बातों को भी गहराई से उकेरती है।

अभिनय

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका अभिनय है। अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा ने अरुण खेत्रपाल के किरदार में मेहनत और ईमानदारी साफ दिखाई है। उनका अभिनय सहज है और वह दर्शकों से भावनात्मक जुड़ाव बना लेते हैं। सिमर भाटिया ने अपने डेब्यू में सीमित स्क्रीन टाइम में भी प्रभाव छोड़ा है।
धर्मेंद्र और जयदीप अहलावत फिल्म की आत्मा हैं। धर्मेंद्र का अभिनय बेहद भावुक और सशक्त है—उन्हें देखकर लगता है कि यह किरदार उनके दिल के बहुत करीब था। जयदीप अहलावत हर सीन में गहराई जोड़ते हैं। दीपक डोबरियाल, असरानी, विवान शाह और सिकंदर खेर जैसे कलाकार भी छोटे-छोटे रोल में याद रह जाते हैं।

निर्देशन

पहले से जानी-पहचानी कहानी को नए अंदाज में पेश करना आसान नहीं होता, लेकिन निर्देशक श्रीराम राघवन ने संतुलन बनाए रखा है। उन्होंने युद्ध और भावनाओं को बराबर महत्व दिया है। भारत-पाक रिश्तों और युद्ध की निरर्थकता पर फिल्म जो संदेश देती है, वह बिना भाषणबाज़ी के दर्शकों तक पहुंचता है।

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क्या है खास

फिल्म सिर्फ एक शहीद की कहानी नहीं, बल्कि विभाजन के दर्द, युद्ध की कीमत और इंसानी रिश्तों की संवेदनशीलता को भी दर्शाती है। सिनेमैटोग्राफी प्रभावशाली है—चाहे युद्ध के दृश्य हों या पाकिस्तान के लोकेशंस। कास्टिंग मजबूत है और प्रोडक्शन वैल्यू साफ नजर आती है।

कहां रह जाती है कमी

कुछ जगहों पर एडिटिंग उलझन पैदा करती है और कुछ युद्ध दृश्य अपेक्षा से कम प्रभावी लगते हैं।

संगीत और वीएफएक्स

वीएफएक्स का सीमित लेकिन जरूरी इस्तेमाल किया गया है। बैकग्राउंड म्यूजिक कहानी के भाव को मजबूत करता है। ‘सितारे’ भावुक करता है, जबकि ‘बन के दिखा इक्कीस’ जोश भर देता है।

देखें या नहीं

अगर आप भावनात्मक, गंभीर और सोचने पर मजबूर करने वाली फिल्में पसंद करते हैं, तो ‘Ikkis’ जरूर देखें। यह शहीद अरुण खेत्रपाल और धर्मेंद्र को एक सच्ची श्रद्धांजलि है। ओटीटी पर इसका असर ज्यादा होगा, लेकिन थिएटर में इसे देखना भी एक अलग अनुभव देता है।

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