भाषा विवाद के बीच मराठी संत की फिल्म ‘नफरत’ नहीं, प्रेम का पाठ पढ़ाती है ‘Sant Tukaram’
भाषाई विवादों के बीच प्रेम और समरसता की मिसाल बनी ‘Sant Tukaram’
रेटिंग: ⭐⭐⭐ (तीन स्टार)
नई दिल्ली, 19 जुलाई 2025
महाराष्ट्र के महान संत और समाज सुधारक Sant Tukaram के जीवन पर आधारित फिल्म ऐसे वक्त में सिनेमाघरों में पहुंची है, जब कुछ राज्यों में भाषा को लेकर राजनीतिक बहस छिड़ी हुई है। वहीं, यह फिल्म दर्शकों को प्रेम, करुणा और समावेशिता का संदेश देती है।
फिल्म का सार
Sant Tukaram, 17वीं सदी के प्रसिद्ध कवि, संत और समाज सुधारक थे। उन्होंने अपने जीवन और रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त छुआछूत, जातिवाद, अंधविश्वास और रूढ़ियों के खिलाफ आवाज उठाई थी। यह फिल्म उन्हीं की भक्ति, संघर्ष और सामाजिक चेतना को ईमानदारी से प्रस्तुत करती है।
वास्तविकता से जुड़ी प्रस्तुति
फिल्म की शूटिंग महाराष्ट्र के कोल्हापुर से कुछ दूर एक गांव में हुई है। निर्देशक आदित्य ओम और पूरी यूनिट ने गांव में काफी समय बिताया ताकि उस युग की जीवनशैली और माहौल को पर्दे पर जीवंत किया जा सके।
आदित्य ओम की सोच
फिल्म की स्क्रीनिंग से पहले मीडिया से बात करते हुए निर्देशक आदित्य ओम ने कहा,
“महान संत पर फिल्म बनाना मेरे लिए गर्व की बात है। मैं चाहता हूं कि आज की युवा पीढ़ी को संतों की महान परंपरा और उनके विचारों से रूबरू कराया जाए।”
उन्होंने आगे कहा कि भविष्य में वह संत कबीर, संत तुलसीदास जैसे संतों पर भी फिल्में बनाना चाहेंगे।
कहानी की गहराई
फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह तुकाराम पारिवारिक बंधनों से ऊपर उठकर भगवान विट्ठल की भक्ति में लीन हो जाते हैं। पत्नी के ताने हों या गांव के रूढ़िवादी ब्राह्मणों का विरोध – तुकाराम कभी अपने रास्ते से नहीं डिगते। वे अपने अभंगों (भक्ति गीतों) और कीर्तन के माध्यम से समाज में प्रेम, समरसता और बराबरी का संदेश फैलाते हैं।
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अभिनय और निर्देशन
- सुबोध भावे ने Sant Tukaram के किरदार को बेहद सशक्त और प्रभावशाली ढंग से निभाया है। उनका अभिनय फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी है।
- अरुण गोविल भगवान विट्ठल के किरदार में पूरी तरह से फिट बैठे हैं।
- संजय मिश्रा ने छोटी भूमिका में भी गहरी छाप छोड़ी है।
- शीना चौहान ने तुकाराम की पत्नी की भूमिका में उम्दा अभिनय किया है।
- बाकी कलाकारों – हेमंत पांडे, गणेश यादव, ललित तिवारी, मुकेश भट्ट, शिव सूर्यवंशी और मुकेश खन्ना (सूत्रधार के रूप में) – सभी ने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है।
- निर्देशक आदित्य ओम ने लेखन और निर्देशन दोनों में संतुलन रखते हुए फिल्म को दर्शनीय बनाया है।
फिल्म का संदेश
यह फिल्म केवल Sant Tukaram की जीवनी नहीं, बल्कि उनके सामाजिक आंदोलन और भक्ति आंदोलन की तस्वीर है। फिल्म यह स्पष्ट करती है कि उनका विद्रोह तलवारों से नहीं, प्रेम, भक्ति और करुणा से प्रेरित था। उन्होंने अपने कीर्तन और भजनों के माध्यम से समाज को जोड़ने और उसे आत्मिक रूप से जागरूक करने का प्रयास किया।
फिल्म क्यों देखें?
यदि आप साफ-सुथरी, सार्थक और ऐतिहासिक धार्मिक विरासत से जुड़ी फिल्में देखना पसंद करते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए है। यह न सिर्फ ज्ञानवर्धक है, बल्कि प्रेरणादायक भी।
कुल मिलाकर, ‘Sant Tukaram’ पर बनी यह फिल्म आज के सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में एक सशक्त संदेश देती है – “भाषा से नहीं, भावना से जुड़िए।”


