‘Aap Jaisa Koi’ रिव्यू: संवेदना और संभावनाओं से भरी, लेकिन सतही बनी…

‘Aap Jaisa Koi’ रिव्यू: संवेदना और संभावनाओं से भरी, लेकिन सतही बनी रह गई कहानी

नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई R. Madhavan और फातिमा सना शेख की नई फिल्म ‘Aap Jaisa Koi’ में दम है, लेकिन गहराई की कमी निराश करती है।


नई दिल्ली, 12 जुलाई 2025

R. Madhavan और फातिमा सना शेख अभिनीत फिल्म ‘Aap Jaisa Koi’ नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो चुकी है। यह एक मध्यम आयु वर्ग के प्रेम की कहानी है, जिसमें सामाजिक बंधनों, आत्म-संदेह और भावनात्मक असुरक्षा जैसे विषयों को छूने की कोशिश की गई है। मगर फिल्म का प्रस्तुतीकरण, लेखन और चरित्र विकास उन भावनाओं की गंभीरता को नहीं छू पाता, जिसे दिखाने की मंशा है।

कहानी की बुनियाद: भावुक, पर अधूरी

फिल्म की कहानी जमशेदपुर के संस्कृत शिक्षक श्रीरेणु त्रिपाठी (R. Madhavan) और कोलकाता से आई फ्रेंच शिक्षिका मधु बोस (फातिमा सना शेख) के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों अकेले हैं और जीवन में किसी संगी की तलाश कर रहे हैं। मुलाकात होती है, रिश्ता परवान चढ़ता है, सगाई तक की नौबत आती है… लेकिन एक छोटी सी असहमति उन्हें अलग कर देती है।

कहानी का दूसरा भाग दोनों के पुनर्मिलन और टकरावों को दर्शाता है, लेकिन यह भाग बहुत जल्दबाजी में और बिना पर्याप्त भावनात्मक गहराई के प्रस्तुत किया गया है। दर्शकों को अंततः यह महसूस होता है कि वह एक आधी-अधूरी सी प्रेमकहानी देख रहे हैं।

लेखन और निर्देशन: विचार नेक, क्रियान्वयन कमज़ोर

राधिका आनंद की कहानी और जेहान हांडा के संवाद विषय को लेकर संवेदनशील हैं — लेकिन ज़रूरत थी, और अधिक गहराई की। निर्देशक विवेक सोनी कुछ दृश्य बहुत खूबसूरत बनाते हैं, खासकर गीत ‘जब तू साजन’ के दौरान, मगर पूरे फिल्म में यह संजीदगी नहीं टिक पाती।

फिल्म एक समय पर मधु के अकेलेपन और उसकी भावनाओं को सामने लाने की कोशिश करती है, लेकिन उनका किरदार सिर्फ R. Madhavan के चरित्र की प्रतिक्रिया बनकर रह जाता है। उसकी आकांक्षाएं, उसका व्यक्तित्व, उसकी परतें – सब अधूरी हैं।

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अभिनय: प्रयास अच्छा, परिणाम मिला-जुला

R. Madhavan की परफॉर्मेंस पहले हाफ में सधी हुई लगती है, लेकिन क्लाइमेक्स में उनका अभिनय बनावटी सा महसूस होता है। वहीं फातिमा सना शेख अपनी भूमिका को ईमानदारी से निभाने की कोशिश करती हैं, लेकिन लेखन का सपोर्ट न मिलने के कारण उनका किरदार अधूरा सा रह जाता है।

आयशा रजा मिश्रा ने अपनी भूमिका में प्रभाव छोड़ा है, लेकिन उनके कैरेक्टर आर्क में नैतिकता को लेकर द्वंद्व झलकता है। नमित दास जैसे अच्छे अभिनेता को बेहद सीमित और रूढ़ किरदार में देखना खलता है।

तकनीकी पक्ष और संगीत: सौंदर्य में छिपी ताकत

देबोजीत रे की सिनेमैटोग्राफी फिल्म का मजबूत पक्ष है। कई दृश्य खास तौर पर गीतों के साथ भावुक और सौंदर्यपूर्ण बन पड़े हैं। ‘धुआं धुआं’ और ‘सारे जग में’ जैसे गाने कानों को सुकून देते हैं, और फिल्म के माहौल में भावनात्मक टोन जोड़ते हैं।

हालांकि, फ्रेंच संवादों की अधिकता और कुछ अंग्रेज़ी शब्दों के बार-बार प्रयोग से कई बार फिल्म अपनी सादगी खो बैठती है।

‘Aap Jaisa Koi’ एक सशक्त सामाजिक संदेश देने की कोशिश करती है — कि प्यार उम्र नहीं देखता, और आत्मसम्मान रिश्तों में जरूरी होता है। लेकिन यह प्रयास लेखन की असंतुलन और सतही ट्रीटमेंट के कारण अपना प्रभाव खो देता है।

अगर निर्देशक और लेखक थोड़ा और ध्यान देते — किरदारों को विस्तार देते, कहानी को और परिपक्व बनाते — तो यह फिल्म यादगार हो सकती थी। फिलहाल यह सिर्फ कुछ अच्छे संगीत, सुंदर कैमरा वर्क और अधूरे एहसासों के साथ आई और चली गई सी लगती है।

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